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Jana Nayagan Movie Case: मद्रास हाई कोर्ट ने CBFC सर्टिफिकेशन प्रक्रिया पर जताई चिंता

तमिल फिल्म “Jana Nayagan” से जुड़े मामले में मद्रास हाई कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने फिल्म सर्टिफिकेशन प्रक्रिया पर एक अहम बहस छेड़ दी है। अदालत ने इस बात पर गंभीर चिंता जताई कि CBFC (Central Board of Film Certification) की Examining Committee के सदस्य कभी-कभी पहले दी गई सिफारिशों से पीछे हट जाते हैं, जिससे पूरी सर्टिफिकेशन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।

यह मामला न केवल एक फिल्म तक सीमित है, बल्कि भारत में फिल्मों के सेंसरशिप ढांचे, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और प्रशासनिक पारदर्शिता से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

Jana Nayagan Movie विवाद क्या है?

Jana Nayagan एक राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर आधारित फिल्म बताई जा रही है। फिल्म निर्माताओं ने CBFC से सर्टिफिकेशन के लिए आवेदन किया था। शुरुआत में Examining Committee द्वारा फिल्म को प्रमाणित (certify) करने की सिफारिश की गई, लेकिन बाद के चरणों में उसी सिफारिश पर पुनर्विचार या बदलाव की स्थिति सामने आई।

यही बिंदु मद्रास हाई कोर्ट की नजर में आया और अदालत ने सवाल उठाया कि

“अगर एक बार समिति सिफारिश कर चुकी है, तो बाद में बिना ठोस कारण के उससे पीछे हटना कितना उचित है?”

मद्रास हाई कोर्ट की अहम टिप्पणी

मद्रास हाई कोर्ट ने कहा कि CBFC की प्रक्रिया में निरंतरता और पारदर्शिता बेहद जरूरी है। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि:

  • सर्टिफिकेशन प्रक्रिया मनमानी नहीं होनी चाहिए

  • Examining Committee की सिफारिशें रिकॉर्ड पर स्पष्ट रूप से दर्ज होनी चाहिए

  • बिना नए तथ्य या कानूनी आधार के फैसले बदलना प्रशासनिक अस्थिरता को दर्शाता है

अदालत का मानना है कि ऐसी स्थिति फिल्म निर्माताओं के लिए अनावश्यक देरी और कानूनी अनिश्चितता पैदा करती है।

CBFC की Examining Committee की भूमिका

CBFC में सर्टिफिकेशन प्रक्रिया आमतौर पर तीन स्तरों में होती है:

  1. Examining Committee – पहली समीक्षा

  2. Revising Committee – यदि विवाद हो

  3. Appellate Tribunal / कोर्ट – अंतिम कानूनी रास्ता

Examining Committee की भूमिका बेहद अहम होती है क्योंकि वही फिल्म की पहली औपचारिक समीक्षा करती है। अगर यही समिति अपनी राय बार-बार बदले, तो पूरी प्रणाली पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सेंसरशिप

यह मामला फिर से उस पुराने सवाल को सामने लाता है —
क्या सर्टिफिकेशन सेंसरशिप है या केवल वर्गीकरण (classification)?

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है, जबकि 19(2) उसके युक्तिसंगत प्रतिबंधों की अनुमति देता है। अदालतों का रुख लंबे समय से यह रहा है कि:

  • फिल्में अभिव्यक्ति का एक वैध माध्यम हैं

  • असहमति या राजनीतिक दृष्टिकोण मात्र के आधार पर रोक उचित नहीं

Jana Nayagan केस में हाई कोर्ट की टिप्पणी इसी संवैधानिक संतुलन को मजबूत करती दिखती है।

फिल्म इंडस्ट्री पर इसका क्या असर पड़ेगा?

मद्रास हाई कोर्ट की यह टिप्पणी भविष्य में कई मामलों में precedent बन सकती है। इसके संभावित प्रभाव:

  • CBFC को स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर और स्पष्ट करना होगा

  • Examining Committee के निर्णय अधिक accountable बनेंगे

  • फिल्म निर्माताओं को अनावश्यक कानूनी लड़ाई से राहत मिल सकती है

  • सर्टिफिकेशन प्रक्रिया में विश्वास बढ़ेगा

यह फैसला खासतौर पर उन फिल्मों के लिए अहम है जो राजनीतिक, सामाजिक या संवेदनशील मुद्दों पर आधारित होती हैं।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, कोर्ट की टिप्पणी यह साफ संकेत देती है कि

प्रशासनिक फैसले “reasoned” और “consistent” होने चाहिए।

अगर CBFC बिना स्पष्ट कारण अपने ही फैसलों को बदलता है, तो वह judicial scrutiny के दायरे में आएगा।

निष्कर्ष

Jana Nayagan Movie केस में मद्रास हाई कोर्ट की टिप्पणी केवल एक फिल्म का मामला नहीं है, बल्कि यह भारतीय फिल्म सर्टिफिकेशन सिस्टम की विश्वसनीयता, पारदर्शिता और संवैधानिक मूल्यों से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा है।

अगर CBFC इस टिप्पणी को गंभीरता से लेता है और अपनी प्रक्रिया में सुधार करता है, तो यह न केवल फिल्म निर्माताओं बल्कि दर्शकों और लोकतांत्रिक मूल्यों—तीनों के लिए सकारात्मक कदम साबित हो सकता है।
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